छाती में ज्वाला, आँखों में अंगार,
सैनिक चले लेकर रण का उद्धार।
बर्फ़ीली चोटियों से बोले स्वर प्रखर,
"अब न सहेंगे अपमान का प्रहर!"
दुश्मन ने जब विश्वास तोड़ा,
भारत के हृदय को छलनी कर डाला,
तो उठे सिंह पुत्र हिमगिरि जैसे,
लेकर वज्र समान भुजदंडों वाला।
बोफोर्स गरजी, टैंक दहाड़े,
पर सबसे ऊँचा था हौसलों का नाड़ा।
हर गोली को सीने से थामा,
पर झुकने ना दिया देश का त्रिरंगा प्यारा।
टाइगर हिल से तोलोलिंग तक,
रणभूमि बनी तपोभूमि।
जहाँ रक्त की धाराओं से,
लिखी गई थी जय की भूमिका भूमि।
"शेरशाह" बना कैप्टन विक्रम,
बोला– "या तो तिरंगा लहराऊँगा,
या फिर उसमें लिपटकर आऊँगा!"
शब्द नहीं, प्रतिज्ञा थी वो,
जिसने देशभक्ति का अर्थ सिखाया।
हर गोली का उत्तर था वार,
हर चोट का बदला था प्रहार।
मरते-मरते भी दुश्मन काटे,
ऐसे थे भारत माँ के सपूत अपार।
जिन्होंने लहू से सींच दिया,
सीमा की पावन माटी को,
नमन है उन अमर जवानों को,
जिन्होंने अमर कर दिया घाटी को।
जय हो उन वीरों की,
जय हो उस बलिदान की,
जय हो उस माँ की,
जिसने रणबांकुरे जन दिए।
कारगिल की वो विजय गाथा,
है युगों-युगों तक गूंजने वाली,
वीर रस की अमिट अमर लेखनी,
भारत की आन-बान-शान निभाने वाली।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X