आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़र के खेत में आंखें मिलन की बीज बोती हैं

प्रेम
                
                                                         
                            नज़र के खेत में आँखें मिलन की बीज बोती हैं,
                                                                 
                            
किसी की याद में ये धड़कनें बरबस ही रोती हैं ।

न जाने क्या लिखा था खत में जबसे पढ़ी है वो,
कभी जगती है वो रातें कभी वो दिन में सोती है ।

अगर जाना ही था तो क्यों तू आया था इधर जालिम,
कि अब मिलकर बिछड़ने में बड़ी तकलीफ होती है ।

बता अब कौन आयेगा मुझे बेजा हँसाने को,
निगाहों की खता अब क्यों मेरी धड़कन ये ढोती है ।

मुझे कोई कहा था बावफा है वो मेरा महबूब,
यकीं अब बात पर उसके मुझे क्यों कर न होती है ।

- कुमार प्रकाश
  8800586410
 वाराणसी

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर