बीत गया सो बीत गया बीता वक़्त मेरा हो नहीं सकता
अब इस शब- ए- ग़म का सवेरा हो नहीं सकता!
उम्रे-पीरी के आख़िरी में हमसे कोई क्या लूट लेगा बशर
वक़्त से बढ़कर कोई और लुटेरा हो नहीं सकता!
-एन आर कस्वाँ
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