हमने जो कसम खाई वोह निभाई भी
हिज़्र-ए-यार में हमने सही तन्हाई भी!
रहे जिसके मुंतज़िर हम उम्र-ए-तमाम
वो ना आई थी और न कभी आई भी!
-एन. आर. कस्वाँ
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