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भजन: निराकार ब्रह्म

                
                                                         
                            प्रभु तो एक हैं, नाम अनेक हैं,
                                                                 
                            
ऐसा विवेक है कहता मेरा।
रूप तो एक है, दिखते अनेक हैं,
ऐसा विधान है दिखता तेरा।।1

त्वचा न पैर, न मुख में वाणी,
तन नहीं, नासिका, कान, न पाणि।
न आँख, न नाक, न कान, न दांत,
चले पर उसकी नेक कहानी।।2

कण-कण में तेरा ही उजियारा,
तू ही जग का एक सहारा।
तेरी इच्छा बिन जग सूना,
तू ही सागर, तू ही किनारा।।3

मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा,
सबमें तेरा ही है नज़ारा।
भेद मिटाकर प्रेम सिखाता,
तू ही जग का सत्य हमारा।।4

पत्ता-पत्ता तेरी माया,
जग में तेरा खेल निराला।
अजर, अमर, अविनाशी दाता,
तू ही जीवन का रखवाला।।5

जब-जब मन में अंधियारा,
तेरा नाम बने उजियारा।
निराकार होकर भी स्वामी,
भक्तों को लगता अति प्यारा।।6
-नरेन्द्र कुमार दीक्षित
 
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3 महीने पहले

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