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युद्ध का माहौल था (हास्य काव्य)

                
                                                         
                            युद्ध का माहौल था होली का पर्व था
                                                                 
                            
कुछ तो हंसी मजाक जरूरी था
जब मुश्किल था खतरों से भागना
तब खतरों से भी लुफ्त उठाना था

डिफेंस सिस्टम एक्टिवेट होने से पहले ही बरबाद किया
तेरे नजरों के मिसाईल ने इस दिल को पूरा तबाह किया

तेरी मुस्कान के ड्रोन भी शामिल थे दिल की बर्बादी में
वो दिल जिसने प्यार तुझ से ओ बेवफा बेपनाह किया

इंटेलिजेंस रिपोर्ट कहती थी “दूर ही रहो इस खतरे से”,
दिल था कि माना नहीं हर अलर्ट वो नज़रअंदाज़ किया

दिल के एयरपोर्ट पर लैंड करनी थी मेरे ख्वाबो की उड़ाने
ट्रैफिक कंट्रोल ने तुम्हारे कभी ओके का इशारा ना किया

इरादा तो था मेरा पक्का दिल तुम्हारा काबिज करने का
तुमने गुस्से से देखकर हर कोशिश को मगर नाकाम किया

हर मोर्चे पर फिर तेरी यादों का बस धुआँ सा उठता रहा,
मेरे ख्वाबों के शहर में हर रात कर्फ़्यू का ऐलान किया

सुलग रहे थे दिल के अरमान तेरे मिसाईल की आग से
उठ रहा था धुआं धुआं सा मेरी जलती हुई तमन्नाओं से

तू बेख़बर मेरे अरमानों से जश्न-ए-ज़िंदगी को मनाती रही,
और मेरा दिल बेचारा खामोशी से युद्ध में शहीद होता रहा
-नंदकुमार भागवत
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3 महीने पहले

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