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उम्मीदों का दीपक जलता रहा

                
                                                         
                            दुनिया की चक्की में मैं गेहूं की तरह पिसता ही रहा
                                                                 
                            
आटा भी न बन पाया मैं गुबार सा बनकर उड़ता रहा

मेहनत की भट्ठी में जलकर भी निखरना ही था मुझे
मगर वक्त की आँधी से हर बार यूँ ही बिखरता रहा

किस्मत की छलनी से भी बार-बार मैं गिरता ही रहा
खुद को भी खुद से अजनबिसा महसूस करता रहा

शायद किसी दिन मेरी भी मिट्टी कोई आकार ले लेगी
अभी तक तो मैं बस हवाओं के संग बस बहता रहा

अजब तमाशा सा देखा है इस दुनिया के मेले में
जो जितना खोखला था वो उतना ही बजता रहा

मंज़िल की राहों में हर मोड़ पे ठोकर ही मिलती रही
मैं धूल झाड़कर फिर नई उम्मीदे लेकर चलता रहा

कभी आंधियों ने रोका मुझे,कभी राहे भी थकाती रही
लेकिन उम्मीदों का दीपक दिल में हमेशा जलता रहा
-नंदकुमार भागवत
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3 महीने पहले

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