आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक नया जहां बसाए

                
                                                         
                            बहुत हो चुकी जंग की बाते अब
                                                                 
                            
कुछ प्यार की भी बाते कर लो
जी जाँ से निभाई अदावत जो अब
दोस्ती भी इंसानियत के नाते कर लो

नफरत की आग भड़की भी तो
ये अपनों को भी जलाती जाती है,
एक मुस्कान, एक मीठा लफ़्ज़,
सदियों की दूरी मिटाती जाती है

हाथों में हाथ लेकर निकले थे तो
आसान हो चले थे सारे ही रासते
खंजर निकालके क्या चलने लगे
वीरान हो चली दुनिया जीने के वास्ते

चलो आज फिर से नई कोशिश करें,
टूटे रिश्तों को जोड़ने का प्रयास करें,
जो जख्म दिए हैं हम ने एक दूसरे को,
उन्हें मोहब्बत से भरने की कोशिश करें।

ना जीत किसी की, ना हार किसी की,
बस इंसानियत का ही परचम लहराए,
जहां हर दिल को मन चाहा सुकून मिले
चलो फिर से क्यों न एक नया जहां बसाए
-नंदकुमार भागवत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर