जय मां कलकत्ते वाली
तेरा वचन जाए खाली
हिल गया अत्याचार एक रात
रण्डचंडी ने हाथ में थामी.
प्रलयंकारी न्याय की सौगात
मुंडा गले में सोहे
खप्पर और कृपाण सजे
अंधर्मी का अंत का
अब चारो ओर नगाड़ा बजे
थरूर थर कांपी पाप की दुनिया
जब हुंकार भरी माता ने
मिट गया अंधकार जगत का श
जोत जलाइ विधाता ने
- भागवत प्रसाद नायक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X