यूं तो हर दिन पैदा होती हैं लाखों संतान
अपने साथ लाती हैं कई सारे अरमान,
अरमानों को पूरा करने की चाह में
कुलदीपक भटक जाते हैं अपनी राह में ,
उन्हें अपने भटकने का एहसास नहीं होता
क्योंकि मां-बाप का साया साथ नहीं होता,
और फ़िर एक दिन ऐसा भी आता है
जब वही कुलदीपक कुलनाशक बन जाता है!!
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X