पछतावा तो जीवन में रहता है।
हम सही का अहम बस रखते हैं।
शब्दों में पछतावा मन भाव होते हैं।
जीवन और जिंदगी में न समझते हैं।
नीरज शब्दों में पछतावा लिखते हैं।
पछतावा एक सच और हकीकत है।
हम सब धोखा फरेब स्वार्थ रखते हैं।
कर्म ही पछतावा ही बन लेख होता हैं।
हर इंसान पाप-पुण्य के साथ रहते हैं।
पछतावा बस हमारे कर्म का लेखा है।
सच कर्म धर्म के साथ हम रहते हैं।
दूसरों की धन संपत्ति को न सोचते हैं।
सच और हकीकत में इंसान बनते हैं।
पछतावा केवल कर्म फल भोगने हैं।
आओ सही राह पर हम चलते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल
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