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मैं हर मोड़ पर विश्वास लिए चलता हूँ।

                
                                                         
                            मुसाफ़िर हूँ, इस राह पर अकेला,
                                                                 
                            
फिर भी दिल में एक आस लिए चलता हूँ।
राहें चाहे कितनी भी कठिन हों,
मैं हर मोड़ पर विश्वास लिए चलता हूँ।

जो शब्द मिले थे राहों में कभी,
उन्हें आज भी दिल में सँजोता हूँ।
टूटे हुए सपनों के टुकड़ों से,
मैं अपने कल को फिर से संजोता हूँ।

दिल चाहता है मंज़िल तक पहुँचूँ,
मगर राहों में काँटे बहुत मिले।
कभी धूप मिली, कभी छाँव मिली,
कभी अपने मिले, कभी अजनबी मिले।

सूरज ढल गया, रात गहरी हुई,
फिर भी उम्मीद का दीप जलता रहा।
अँधेरों ने लाख डराया मुझे,
मगर मेरा हौसला आगे चलता रहा।

माना अनजान हैं राहें मेरी,
मंज़िल का अभी पता नहीं है।
पर कदमों को रुकना मंज़ूर नहीं,
दिल में कोई डर बचा नहीं है।

घाव पुराने हैं, ज़ख्म भी गहरे,
आँखों में नमी अब भी रहती है।
लेकिन हर दर्द यही कहता है—
ज़िंदगी हारने से नहीं, लड़ने से बनती है।

जुगनुओं की रोशनी कम सही,
पर रात को रोशन करने के लिए काफी है।
एक छोटी-सी उम्मीद भी अक्सर,
पूरी ज़िंदगी बदलने के लिए काफी है।

मुसाफ़िर हूँ, सफ़र मेरा थमेगा नहीं,
मंज़िल की तलाश में ये दिल रुकेगा नहीं।
राह चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न हो,
मेरे कदमों का हौसला झुकेगा नहीं।
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एक घंटा पहले

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