आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भारत की बेटी दामिनी

                
                                                         
                            वो कौन सा दर है, जो मुझे अपनायेगा?
                                                                 
                            
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
क्या कसूर था मेरा जो दी मुझे ये सजा?
क्यों मिली मुझे ये दर्दनाक मौत वेवजह?
कोई तो मुझे बताओ मेरे सपने अब कौन सजाएगा?
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
अपनों के साथ खुश थी मै बहुत
जिंदगी जीने की चाहत थी मुझमें बहुत
कोई तो बताओ मेरे अपनो को अब कौन हंसाएगा?
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
मुझे मौत देने वालों को सजा-ए-मौत नहीं
क्या मेरी जिंदगी की कोई अहमियत नहीं?
कोई तो मुझे बताओ मुझे इंसाफ अब कौन दिलाएगा?
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
मेरी मौत को युवा क्रांति कहा गया
और उन्ही आवाजों को लाठी तले दबा दिया?
कोई तो बताओ इस क्रांति का अंत क्या कहलाएगा?
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
लोग कहते हैं देश-विदेश में छाई थी
सियासत की नींव मैनें हिलाई थी
कोई तो मुझे बताओ क्या इससे मुझपे लगा दाग मिट पाएगा?
क्या एक बेटी का हक मुझे कभी मिल पाएगा?
आज भी बीच चौराहे पे खड़ी हूँ मैं
इस इन्तजार में की नया दौर आएगा
जो मुझे ही नहीं हर बेटी को उसका हक दिलाएगा
दामिनी के दामन के दाग को मिटाएगा......!!!!

मोनिका यादव


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर