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मैं वो वजह थी, जिसके हर एक बोल में हंसी थी,

                
                                                         
                            न जाने वो कौन सी बात थी,
                                                                 
                            
जो पत्थर को भी पिघला गई।
हाँ, मैं पत्थर सी ही सही,
पर उसने मुझे भी तोड़कर पिघला दिया।
न जाने वो कौन सी रात थी,
जब से इस दिल ने रोना सीख लिया।
न जाने वो कैसा दर्द था,
जिसने इस दिल पर हक़ जता लिया।
न जाने वो कौन सा दिन था,
जिसके बाद मेरा आज बर्बाद हो गया।
अब तो हंसने पर भी जैसे कर्ज लगता है।
मैं वो वजह थी, जिसके हर एक बोल में हंसी थी,
मैं वो पक्षी थी,
जिसे आसमा में उड़ने का शौक था।
हाँ, मैं वही पक्षी हूँ,
जिसके पर काट दिए गए!
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54 minutes ago

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