"चाँदनी में, मेरे सारे दर्द छिपें क्यों हैं"
चाँद! ये बताओ,तुम्हारे चाँदनी में,
मेरे सारे दर्द छिपें क्यों हैं।
तुम तो रात भर,चाँदनी में तैरते हो,
मेरा दिल रात भर,यूँ रोता क्यों हैं।
जिंदगी की दांस्ता,सारे दिल में पड़ें,
झाकूँ जरा तो,दिल यूँ खाली क्यों हैं।
चाँद! ये बताओ,तुम्हारे चाँदनी में,
मेरे सारे दर्द छिपें क्यों हैं।
सितारें जड़ीं रात,जब मुझे किताब सी लगें,
उन पन्नों को पलटू,तो यूँ भीगें से क्यों हैं।
दास्तानें 'मन' जब-जब सुनाया तुम्हें,
तुम्हें मेरे संग-संग,यूँ तड़पता क्यों हैं।
चाँद! ये बताओ,तुम्हारे चाँदनी में,
मेरे सारे दर्द छिपें क्यों हैं।
******************"मन".[बावरी]
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