मैने जलती हुयी चिता से पूछा
जिसकी लपटें नभ को छूने को आतुर
उछल कूद कर कर रही थी नृत्य
मैने कहा बतलाना सत्य
क्यों इतना शोर कर रही हो?
क्या तुम्हे नही है जरा भी शोक
चिता ने कहा-
हर इंसान को मालूम है सत्य शाश्वत
उसे मिलना है मिट्टी मे किसी न किसी क्षण
परन्तु भूल जाता है यह सत्य शाश्वत
धन यश पद के मद मे
जो असहायों को लूट खसोटकर कमाया है
आज जब जिन्दगी साथ छोडकर गयी
मौत ने उसे कुछ भी न ले जाने दिया
एक धेला भी वह साथ न ले जा सका
हंस रही हूं
कितना मूर्ख है यह इन्सान
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