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“मौन का बोझ - जब शब्द हार गए”

                
                                                         
                            तुम सामने आ भी जाओ कभी,
                                                                 
                            
तो शायद मैं फिर भी चुप ही रहूँ…

क्योंकि कुछ सच, शब्दों में नहीं,
सिर्फ़ खामोशी में ही पूरे होते हैं।

तुम्हारा यूँ चले जाना,
मेरे जीवन की बस एक घटना नहीं था
वो एक ऐसा सत्य था,
जिसने मुझे भीतर से बदल दिया।

आज भी तुम्हें देखूँगा मैं,
पर वैसे नहीं जैसे पहले देखता था…
अब मेरी आँखों में सवाल नहीं,
सिर्फ़ एक शांत स्वीकृति होगी

और शायद… तुम्हारे लिए एक अनकहा आईना।
वही मौन,
जिसे तुमने कभी समझा ही नहीं था,
और उसी में छिपी है
तुम्हारे जाने की पूरी कहानी।

कभी फुर्सत मिले,
तो इस खामोशी को सुनना…
शायद उसमें तुम्हें
अपनी ही आवाज़ सुनाई दे।”

 
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एक महीने पहले

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