आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

“ऐ ख़ुदा तेरा शुक्रिया!”

                
                                                         
                            ऐ ख़ुदा तेरा शुक्रिया, बहुत दिया, जो दिया….
                                                                 
                            
कमज़र्फ़ थे कभी ख़ुशी में तुझे ना याद किया!

ज़िन्दगी तो बस सबकी यूँ ही गुज़रा करती है,
कुछ इसको दिया और कुछ उससे ले लिया…!

चंद बातें कीं, कुछ क़िस्से भी सबसे कह डाले;
लबों को अपने कुछ मुद्दों पे लेकिन सी लिया!

जब मिली ख़ुशी, बटोर ली अपने दामन में…
ऐसे ही ग़म का हमने हंसते-हंसते जाम पिया!

क़िस्मत ने कभी रौशनी को आफ़्ताब बख़्शा,
और कभी तो हमें नसीब ना हुआ एक दिया…!

दुनिया ने तो रंजिश ही निभाई मोहब्बत से,
हाँ, हमने मगर प्यार से सब को प्यार किया!

मासूम थे पीठ में हम खंजर ताउम्र खाते रहे…
मजाल है कभी पलट दोस्त पर वार किया!!

 मोहनजीत कुकरेजा

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर