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जीत हार

                
                                                         
                            एक को तो हारना ही था
                                                                 
                            
दूसरे की जीत के लिये
जो हारा है केवल उसी का
संघर्ष जारी है
नहीं.......
जो जीत गया संघर्ष उसके
लिये भी बाकी है
हार में लौटना उसे
मंज़ूर नहीं
सिंहासन से उतरना उसके
लिये अब और मुश्किल है
हारने वाले के लक्ष्य में
अभी कईं मंज़िल हैं
दोनों के पैरों तले
एक समान सा संघर्ष है
बरसता रूदन भी है
खिल खिलाता हुआ हर्ष है

मेहर की कलम से

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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