सीलन-भरी दीवारों पर, यादों का पहरा गहरा है,
कोरे काग़ज़ के सन्नाटे में, थका हुआ एक चेहरा है।
सिक्कों की खनक हथेली पर, अब उपहास-सी बजती है,
झूठी आधुनिकता की वह... हर साँस उधार-सी सजती है।
वे पिता, वे गुरु, वे मौन सिसकते— बोध-वाक्य, वे कड़वे स्वर,
तब बेड़ियाँ लगती थीं मुझको... अनुशासित वे रातें, वे घर।
खेल-कूद और हुड़दंगों को, जब मैं 'जीवन' कहता था,
मृगतृष्णा के उन्मादों में, बनकर उन्मत्त मैं बहता था।
तब थरथराते होंठों ने, इक धीर-गंभीर स्वर साधा था—
"जिस 'जीने' पर मद है तुझको, वह जीवन-पथ की बाधा है,
ये आवारागर्दी तुझसे... तेरा कल तक छीन लेगी,
तू जिसे भोग समझे बैठा, वह तेरा बल तक छीन लेगी।"
मैं बागी था, मैं उन्मुक्त था, मुझे 'आज़ादी' प्यारी थी,
पिता की जीर्ण-शीर्ण धोती पर, मेरी महत्त्वाकांक्षा भारी थी।
मैंने कहा— "डिग्रियाँ अब... रद्दी के भाव बिकती हैं,
ये दुनिया बड़ी है बाबूजी! यहाँ बस चतुरियाँ टिकती हैं।"
वे टूटकर बोले— "वत्स! कच्चा लोहा रह जाएगा,
अनुशासन बिन प्रखर मेधा भी... भटकाव में बह जाएगा।
जिसे तू आज़ादी कहता है, वह उत्तरदायित्व से पलायन है,
भ्रमित राही! ये पथ नहीं... ये तो अंत का ही रामायण है।"
आज अधेड़ उम्र की दहलीज़ पर, खड़ा हूँ मैं निढाल सा,
खुद के ही बुने जाल में, अब कैदी हूँ... बेहाल सा।
आइने में अजनबी अपना ही, चेहरा देख मुस्कुराता हूँ,
"बाबूजी! आपकी ही हार था मैं"— सिसकते हुए बताता हूँ।
तभी मिली वह चिट्ठी पुरानी, धूल-धूसरित पेटी में,
शब्द अभी तक जीवित थे... यादों की बंजर मिट्टी में।
लिखा था— "पुत्र! जब लगे कि सब... निःशेष-शून्य हो गया है,
समझना... नया प्रारंभ करने का, विहान फिर से हो गया है।"
"बस एक शर्त है इस दफ़ा, खुद से कभी न झूठ बोलना,
पश्चाताप की इन बेड़ियों को... संकल्प की कुंजी से खोलना।"
मैंने फाड़ दिया वह 'अधूरा खत', जो शिकवों से भरा पड़ा था,
मेरे भीतर का वह ढीठ बच्चा... अब शांत, समझदार खड़ा था।
अब शिकायत नहीं है काल से, न प्रारब्ध को रुलाना है,
हिसाब अब नियति से नहीं— आत्म-जमीर से चुकाना है।
बाहर सावन थम चुका था, भोर की खिड़की खुली थी,
पिता की उन 'सनातन' सीखों ने... मेरी 'झूठी' आधुनिकता धो दी थी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X