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इक मुद्दत से चले हुए लोग हैं हम

                
                                                         
                            हां राहों में फले हुए लोग हैं हम
                                                                 
                            
फुटपाथों पे पले हुए लोग हैं हम

ना पानी में गले हुए लोग हैं हम
ना आगों में जले हुए लोग हैं हम

हम थे हम हैं वहीं जहां राह में थे
इक मुद्दत से चले हुए लोग हैं हम

राहों में अब कहीं सुखाओ तो हमें
कागज के हैं गले हुए लोग हैं हम

ना थे हम खास खादिमों के यूं कभी
शाहों को भी खले हुए लोग हैं हम
-मारूफ आलम
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एक घंटा पहले

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