"तुम चाहते क्या हो - तुम्हें भूल जाएँ ।
लेकिन कभी सोचा है?
दूरियाँ करने से हमीं थोड़े न दूर होंगे
तुम भी होंगे इस इश्क के जंजीर से
" तुम चाहते क्या हो - हमेशा के लिए नजरअंदाज कर दें ?
छोड़ दें तुम्हारे पल्लू
अलग हो जाए हमेशा
जैसे धरती, चाँद से दूर है
जरा सोचो ?
कोई बात बिगड़ जाएँ
हथेली पे अपने ग़म आ एँ
तो क्या होगा?
कुछ चेहरे हमारे हैं
कुछ चेहरे तुम्हारे हैं
पर इतने प्यारे हैं
तुम चाहते क्या हो - आखिरी साँस तक तुम्हें न देखें
यों ही अलग रहे, बेख़बर रहे
न मिलो, न मिले हम
काटे सारी उम्र बेफिक्र तन्हाई में
लौटें न फिर तुम्हारे शाम तक
तुम्हारे सुबह तक
तुम्हारे दहलीज तक
-मनोज कुमार यकता
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