जिस डाली पर पंछी बैठे
आशियाना उसका है
पर्ण वृंद शीतल छाया में
आबदाना उसका है
मत काटो, उस डाली को, कि
नीड़ में अंडज सोये हैं,
कल को मीठी गीत सुनाने,
आज सपनों में खोये हैं,
मानवता न क्षीण करो हे!
मानवता के पुजारी हो,
करो प्रकृति का अभिनंदन
तुम जिसके अधिकारी हो!!
प्यास धरा की बढ़ी जा रही
पानी का अब व्रत है मौन
कल पुर्जे बने क्रूर हठी हैं
विष जल को अब रोके कौन
नदियाँ भी अब रुग्ण- रुग्ण हों
अपनी कसमें भूला रहीं
हे मानव! मन भरो चेतना
व्यथा निवारण बुला रहीं
विद्वत्ता की बोझ ढो रहे
स्वयं स्वयं पर भारी हो!
करो प्रकृति का अभिनंदन
तुम जिसके अधिकारी हो!
प्राण वायु भी वजनी हो गये
सांसों का हल्कापन चंपत
हृदयानंद भी टूट रहें हैं
भरा गगन में धूम्र है रंपत
सुविधाओं की भोग लोभ में
घातक हो रहे प्राणवायु
हर काया में रोग छिपा है
कम से कमतर हो रही आयु
अब तो मानव जी रहा ऐसे
जीने की लाचारी हो
करो प्रकृति का अभिनंदन
तुम जिसके अधिकारी हो!!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X