चलते चलते राह में एक पत्थर का टुकड़ा आया,
मैंने ठोकर मार दिया तुम्हारा दिल समझकर!!
वो बेरूखी नहीं ,तुम्हारी बेरहमी की इंतेहा थी,
क्यूँ ऐसे ठुकरा दिया, हमें कातिल समझकर!!
हम दोनों एक ही नदी के किनारे बनकर रहे
पास रहे पर, मिल न सके, "समदिल" बनकर!!
कौन कहता है कि ये रिश्ता अब टूट ही गया,
सच है कि कभी जुड़ा नहीं, मंजिल बनकर!!
तुम चले गये तो अब नया सफर शुरू हुआ है,
कोई तो आयेगा इस तूफां में, साहिल बनकर!!
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