सदियाँ बीत गईं दिल की इस इबादत में,
और ज़िंदगी ढल गई तेरी इक चाह में।
दो उम्रें बसर हुईं इस इश्क़ के तराने में,
एक तेरे इक़रार की आस में, एक तेरे इंतज़ार में।
एक तुझे पाने की पाक दुआओं में,
एक तुझे पाकर फिर खो देने के मलाल में।
एक तेरे आने की ख़ुशी सजाने में,
एक तेरे जाने का दर्द दिल में छुपाने में।
एक तेरे ख़ामोश जज़्बात समझने में,
एक अपने बेपनाह इश्क़ को समझाने में।
कभी सोचा भी है तूने ठहर कर ज़रा,
कि कैसे जी रहा है यह 'फ़क़ीर' इस बेदर्द ज़माने में?
— मनोज भटकर ‘फ़क़ीर’
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