उंगली पकड़ चलना सिखाया
अच्छे बुरे का भेद बताया
बिन पूछे बिन बताए ही
अंतरिक्ष में उड़ानें भर गए
मुझसे तन्हा साथ के मारे
वक्त से निष्कासित बेचारे
काठ-छड़ी की उंगली थामे
उम्र को धकेलना सीख गए।
-मं शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X