चाँदनी को मिली आँधियों की सजा
अब अँधेरों से होना मुखातिब नहीं
जल रहे हैं चराग बातियों के बिना
रात के डर से बुझना मुनासिब नहीं
-मंजू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X