गुल खिले हैं मगर रो रही है फिज़ा
खुशबुओं से होना मुखातिब नहीं
सर्द की बारिशों का है अपना मजा
बेवक्त भीग जाना मुनासिब नहीं
-मंजू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X