कैसे जिंऊ तेरे बिना बता तू जरा
कहां मैं जाऊं तेरे बिना बता तू जरा
तेरी यादें जो रूलाती रही हैं
कैसे रहूं मैं तेरे बिना बता तू जरा
मैं भुलाना जो चाहूं भुला भी न पाऊं
ये सासे न चलती तेरे बिना बता तू जरा
तुम्हारे लिए जो सपने हैं देखे
पूरा करूं कैसे तेरे बिना बता तू जरा
तुम्हारी ये यादें जाती नहीं है
हर पल मुझे तड़पाती रही हैं
किसको मैं लाऊं इन धड़कनों में
जो चलती नहीं है तेरे बिना बता तू जरा
रोता रहा हूं मैं रातों में जगकर
ये दुनिया है सूनी तेरे बिना बता तू जरा
- मनीष पाण्डेय
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X