शरद की रात, पर्दे से निकल कर
चमकती चांदनी के साथ मिलकर
मेरे हर लफ़्ज के मानी बदल कर
मेरे ही साथ फिर पानी में चलकर
तुम अपनी ऊंगलियों की हरकतों से
बुनो दुनिया नई, जिसमें कि जानां
हमारा ख्वाब ही बस हो हकीक़त
रंग नीला, हरा, पीला, गुलाबी
देख इक दूसरे को मुस्कुराएं
पड़े जब रोशनी आंचल से छनकर
रंग ये और खिलकर सामने आएं
और सारे रंग लिपट एक दूसरे से
मोहब्बत को उभारें कैनवास पर
बस इतना ख्वाब ही मैं कुछ दिनों से
मुसलसल देखता ही जा रहा हूँ
शरद की रात फिर से आ गई है
और अब बाकी नहीं कोई बहाना
सो तुम्हारी इक झलक की जूस्तजू में
मैं शिकारे पे लिए पशमीना चादर
तुम्हारा आज शब रस्ता तकूंगा
- मनीष "आशिक़ "
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