दुनिया बदल रही है, बंधु!
बदल रहे, हर देश!
स्व निर्भरता, लक्षय हो, अपना!
समय का ये, संदेश!
मेहनत को जो, धर्म मानते,
उन्ही का बजता, डंका!
अविवेक से कर्म,करे जो,
उसकी लग जाए, लंका!
प्रथम राष्ट्र है, फिर कोई, व्यक्ति!
सोच, समझ कर, हो अभिव्यक्ति!
राष्ट्र एक, तो नियम भी एक, हो!
इसमें कैसा, क्लेश!
एकता अपनी, ताकत है!
जनतंत्र का ये, आदेश!
राष्ट्र प्रेम ही, सर्वोपरि हो!
कवि का, ये उपदेश!
-मृदुल मनीष
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