चांदनी रात में नहाने का, हुनर उन्हें खूब आता है,
दिल में लगी आग, कोई इस तरह भी बुझाता है।
दूधिया उजाले में, मन थिरक थिरक जाता है,
बेसुध आसमान, जमीन से शर्माता है
संगमरमर सा बदन, रौशनी से जल जाता है,
सोए हुए अरमान कोई, फिर से जगा जाता है
इतराती है नदी भी, अपनी किस्मत पर,
रोज कहां ऐसा मेहमान नजर आता है।
बरस रहे शोले, फूलों के जानिब
कितना भी इसे संभालो, दिल मदहोश हुआ जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X