जीवन बिता जाए, संगतिया!
दीप मे ज्यूँ! जली जाए, बतीया!
क्षणभंगुर! ये दिवा, निगोडा!
मृग मरीचिका है, ये रतियाँ!
चार पहर! रहे मन, बेकल!
चिंता से, फटी जाएं छतीयां!
बिते कल! यौवन, मुरझाया!
दिन, दिन लुटती, जाए संपतियाँ!
जीर्ण, शिर्न यह तन भयो, रोगी!
किसके पास लिखाये रपटिया!
कौतुक! लगता, अब तो दर्पण!
नित्य नवीन, ज्यूँ करे कपटीया!
छोड़ गए वो, यार, मित्र, भी!
जिनसे रिश्ता, रहा, लंगोटिया!
सत्य ज्ञान, बस पाया, इतना,
जीवन क्या है! मृग मरीचिका!!
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