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मेरा शहर

                
                                                         
                            बचपन बीता यहां,
                                                                 
                            
येंही पे स्वर्णिम वक्त गुजारा,

मजबूरी में हुआ प्रवास,
मगर आज भी दिल के करीब है, आरा।

वो रमना का मैदान,
जहां खेलते थे हम नादान,

वो चंदवा का मोड़,
समोसे खाने की जहां, लगती थी होड़,

राधा स्वामी का आश्रम,
हर धर्म का वहां होता था, संगम।

पकड़ी चौक का दशहरा,
मन से आज भी नही बिसरा,

कचहरी की लिट्टी,
स्मृतियां है मीठी, खट्टी,

शाहिद भवन की जलेबी, पूरी,
स्वाद लाजवाब, महक जैसे कस्तूरी,

नवादा की वो सोंधी सी चाय,
सुगंध जिसकी रग रग में समाय,

महावीर मंदिर के सामने, चाट की वो ढेरों दुकानें,
पानी भर आता है मुंह में, दिन कितने थे वो सुहानें,

छट पूजा में, सूर्य मंदिर पर बजते पवन सिंह के गाने,
स्वप्न में आज भी आ जाते है, धूम मचाने,

अनगिनत स्मृतियां, भूली बिसरी यादें,
इश्क है तुझसे मुझे, मेरे शहर,
सोचा कविता बना के तुझे लुभा दें।
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एक वर्ष पहले

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