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गम में डूबी शाम

                
                                                         
                            कब तलक रहेगी ये, ग़म में डूबी शाम
                                                                 
                            
कब तक पिऊंगा मै, नाउम्मीदी का जाम

फुरसत ही फुरसत है, जीवन में यारों
जिंदगी जा रही है, यूं ही बेलगाम।

मुफलिसी का है मारा, ये दिल है, बेचारा
इसे कौन कहता है, प्यारा कलाम।

जिन रास्तों पे चल के, हम पहुंचे यहां पर,
उन्हीं पे तो चलता है, सारा आवाम।

कभी तो मिलेगी, हमे भी वो मंजिल
की जिसके लिए हम, भटके उम्र ए तमाम

बहुत थक गया हूं, भटकते भटकते
मुझे चाहिए अब, लंबा आराम।
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एक वर्ष पहले

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