शाख से टूटे पत्ते की मानिंद है, हम
जुड़ेंगे नहीं फिर, पर कोई नही ग़म,
जब तक शाख के साथ रहे,
लगाते रहे कहकहे,
कई यादें, कई वादें,
कई किस्से हैं, अनकहे,
सहलाते रहे, बहलाते रहे
धूप और बारिश से बचाते रहे,
टूट कर गिरे भी, तो दुआ दी
अपनी जगह, नए कोंपलों को जगह दी,
बस इतना ही था, शाख से रिश्ता मेरा
अब उसके कदमों में है, मेरा बसेरा,
हवाएं आएंगी ले जाएंगी, कहीं दूर
क्या करें कि यही है, जिंदगी का दस्तूर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X