जो लोग दूसरों को डराते हैं,
वस्तुतः, वो अपनी कमी छिपाते हैं,
डर ये कि कहीं, कोई बोल न दें
कुत्सित कर्मों के राज खोल न दें।
डरा कर जो शेखी बघारता है,
पौरुष नहीं, ये कायरता है।
हर डर का एक अंतिम पड़ाव आता है,
जब इंसान का जमीर जाग जाता है।
डराने वाले का फिर मिट जाता है, नामोनिशान,
इतिहास भी करता है बार बार, उसका अपमान।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X