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बुढ़ापा

                
                                                         
                            अपने दूर भागते हैं, तन्हाई का शोर होता है,
                                                                 
                            
बुढ़ापा जिंदगी का अजीब दौर होता है।

जिन्हें पाला था, लहू से सींचकर,
वो भी देखते हैं, मुंह भींचकर

एक टीस सी उठती है, आंखों में लोर होता है,
बुढ़ापा जिंदगी का अजीब दौर होता है।

जिस घर में चलती थी, कभी हुकूमत
अब हर रोज उसी घर में, झेलते हैं जलालत,

नाउम्मीद जीवन का यही, ठिकाने ठौर होता है,
बुढ़ापा जिंदगी का अजीब दौर होता है।

बंद कमरे में सिमट गया आशियाना,
गैर तो आते ही नहीं, अपनों का भी कम होता आना जाना,
आंखों में आंसू, हाथों में मुंह का कौर होता है,
बुढ़ापा भी जिंदगी का अजीब दौर होता है।
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एक वर्ष पहले

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