जब अपना कोई दगा देता है,
जिंदगी बोझ बन जाती है,
मौत के ख्वाब जगा देता है।
नजरों में खून उबलता है,
दिल जोर जोर चलता है,
धड़कनों में हरारत सी रहती है, हर पल,
एतबार के दीप बुझा देता है,
जब अपना कोई दगा देता है।
दिल पे छप जाती है, उमर के लिए,
कभी मिटती नही दगादरी की चोट,
लाख चाहे कोई मगर न भूले,
जिंदगी भर रह जाती है, एक कचोट,
खुद से उठ जाता है भरोसा, यारों,
तन्हा रहने का हुनर सिखा देता है,
जब अपना कोई दगा देता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X