जीवन का ये, अंतिम दौर!
बनना है,अब मृत्यु का कौर,
क्या कुछ खोया, क्या कुछ पाया,
मंथन किया, तो मन भरमाया,
जीवन की कुछ रही, उपलब्धि,
टोकरी भरी रखी, कुछ रद्दी,
अब सोचूं तो ये लगता है
हानि, लाभ अब एक समता है,
रहा सफलता का ना मान,
यश, अपयश सब एक समान,
गर्व था जिसपे, वो शरीर भी,
जीर्ण, शीर्ण हो गया, अभी
अंतर में जो बजता नाद,
वो ही अंतिम, सत्य संवाद,
जग में कोई, किसी का कौन,
इससे आगे मौन ही मौन।।
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