आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुस्किलों को शर्मिंदा:......

                
                                                         
                            मुश्किलें हो जाएं शर्मिंदा
                                                                 
                            
ऐसे मुश्किलों को शर्मिंदा करना
भले परिस्थितियां विपरीत हो
समय साथ ना दे
परंतु,हौसलों को जिंदा रखना
एक टूटे हौसलों के साथ
फिर दूसरा सपना देखना
जब तक इस धरा पर
सांसे चले
हार का लिबास न पहनना
रुकना समस्या का समाधान नहीं
खुद को प्रोत्साहन देना
मंजिल मिलेंगी क्यों नहीं
मंजिल को भी एक बार
खुद का पता देना
मुश्किल हो जाए शर्मिंदा
ऐसे मुश्किलों को शर्मिंदा करना
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर