उदास ये धरती अंबर हो जाते
जब मानव-मानव में जंग छिड़ जाते
भयावह वह दृश्य होता
जब युद्ध मानव-मानव के बीच होता
एक दूसरे के रक्त के प्यासे
मानव-मानव को ना देते दिलासे
कैसे धरती अंबर खुश होंगे
जब अपने ही अपनों को दुख देंगे
लहू लुहान धरती मां के
आंखों से अश्कों की मोती बरसे
हमारे गोद में खेले बालक
हमारे गोद में मूर्छित होते
देख न सकूं मैं आंखों से यह मंजर
हमारे देश के कैसे-कैसे तस्वीर बदले
जहां प्रेम अहिंसा का बोलबाला था
वही आज मनुष्यों की बली चढ़े
आघात हो जाती हूं मैं समझ न पाती मैं
क्यों इतनी उत्पात मची
जहां प्रेम सद्भावना को
दिया जाता सर्वप्रथम स्थान
वही खून की होली दिवाली मने
आपस में मेल से रहते नहीं
क्यों एक दूसरे को तंग करते
मैं अन्दर ही अन्दर टूट जाती
जब मेरे बच्चे आपस में जंग करते
काश, इनमें सद्बुद्धि होती
मैं भी संतुष्ट और सुखी होती
शांति मिलती मुझे
जब हर तरफ खुशहाली होती
मेरी आंखे कभी नम न होती
जब आपस में सब मिल जुलकर रहते
हर तरफ खुशियों के होली दिवाली मनते
जब सब प्रेम और भाईचारे के साथ
घुल मिल कर रहते...................।।
-ममता तिवारी
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