रूह का रोना था ,,,
तुम क्या ही समझते,
आंखे नम थी नहीं तुम्हारी तो ,
तुम क्या समझते,
नासमझ से समझदार बनकर,
अपनी गलतियों पे पर्दा डाल रहे हो अब,,,,,
मुझे नासमझ बताकर,,,
खुद के कर्मों का हिसाब ,
फिर हमसे चाह रहे हो अब,
आकलन खुद का भी करना था,जब,,,हमे सता रहे थे,
अब हम जो कुछ बोल भी दे तो,,
मानसिक स्तर देख रहे हो।
यू इश्क इबादत न होती तो ,,
हम कब का छोड़ चुके होते ,
अब अपनी चाहत को प्यार का ,
नाम दे रहे हो।
जो खुद न हुआ तो हमें भी
न होने का इल्ज़ाम लगा रहे हो।।।
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