आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रूह का रोना

                
                                                         
                            रूह का रोना था ,,,
                                                                 
                            
तुम क्या ही समझते,
आंखे नम थी नहीं तुम्हारी तो ,
तुम क्या समझते,
नासमझ से समझदार बनकर,
अपनी गलतियों पे पर्दा डाल रहे हो अब,,,,,
मुझे नासमझ बताकर,,,
खुद के कर्मों का हिसाब ,
फिर हमसे चाह रहे हो अब,

आकलन खुद का भी करना था,जब,,,हमे सता रहे थे,

अब हम जो कुछ बोल भी दे तो,,
मानसिक स्तर देख रहे हो।

यू इश्क इबादत न होती तो ,,
हम कब का छोड़ चुके होते ,

अब अपनी चाहत को प्यार का ,
नाम दे रहे हो।

जो खुद न हुआ तो हमें भी
न होने का इल्ज़ाम लगा रहे हो।।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर