रातों का जिस्म छलनी होने से बचा लिया
हमने उनकी याद का दीपक बुझा दिया
आंखों की जिद्द थी उनका दीदार करेगी
आंखों में दिल था दिल को दुखा दिया
-लोक डोंगरे स्वप्निल
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