बिहार तुम अनुपमेय हो
तुम श्रद्धा और श्रध्ये हो
तुम लताकुंज की
वो सशक्त शाख हो
जिसकी बेल थामे
विश्व प्रगतिशील था
आज भी बिहार तुम
कर्म के प्रतीक हो
बिहार तुम अनुपमेय हो
गंगा पुनपुन सोन गंडक
की बहती अमिय धार है
नवचेतना, नव प्रेरणा
का यहां संचार है
बौद्ध विहार की शांति
वाहे गुरु की शान है
भौतिकता के बिम्ब से परे
यहां आज भी स्वाभिमान है
बिहार तुम अनुपमेय हो
तुम अलौकिक तथ्य
तुम ही शांति पथ हो
फिर चाणक्य की धरती
आज क्या किंचित पथ भ्रमित
कदाचित स्मरण नहीं नीति
अशोक, चन्द्रगुप्त की
क्यूं सिया की नगरी में आज
संशय का संवाद है
बिहार तुम अनुपमेय हो
शस्य श्यामला धरा
आज भी है पुकारती
घर घर डगर नुकीली झाड़
विचारों की है त्रासदी
चेतो, उठो, मत देखो
निर्निमेष इस ह्रास को
गर लौहखंड जंग खा गया
तो रिक्त धरा, सब दिशाहीन
अनुपमेय हो तुम बिहार
सशक्त भी सचेत् भी
तुममें है संपदा
संतति,सौहार्द्य भी
तुममें है शौर्य
और धैर्य अपरिमित भी
कलाओं का अनूठा संगम
और जानकी की प्रीत भी
बिहार, तुम अनुपमेय हो
स्वयं को पहचानो तुम।
लीना झा
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