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"शिव स्तुति"

                
                                                         
                            चंद्र उतंग जटा बिच सोहत गंग तरंग बहै जल धारा।
                                                                 
                            
कंठ बिराजत सर्प विशाल महा विषपान किए शिव सारा।।
दुन्दुभि बाजत शंकर नाचत शोभित देव सदाशिव प्यारा।
'रुद्र' दयाल महा त्रिपुरारि हरौ दुख मो जग कौन सहारा।।१।।

भस्म रमावत अंग निरंतर ध्यान धरै जन के दुखहारी।
हाथ त्रिशूल लिए गल में विकराल भुजंगहि भूषण भारी।।
लोचन तीसर खोलि महाप्रभु सुन्दर रूप महा बलिहारी।
'रुद्र' कृपा करिये प्रभु मोहि नमामि नमामि सदा त्रिपुरारी।।२।।

मंगल गावत वेद - पुराण न अंत लहै सुर ब्रह्मा बिचारे।
तांडव नृत्य करै जब शंभु धरा नभ मंडल कंपित सारे।।
सत्य शिवंकर सुंदर आप अनाथ के नाथ सदा रखवारे।
'रुद्र' विलोकत पाप कटैं सब तारिहु मोहि महा प्रभु प्यारे।।३।।

पर्वत वास करै मनभावन बैल चढ़े शिव संकट हारी।
शीश जटा बिच चंद्र खिली छवि श्यामल कंठ लसै अति भारी।।
ध्यावत जो पद पंकज पावन संकट काटत शंभु पुरारी।
'रुद्र' महा दुखमोचन नायक तारहु मोहि कृपा कर भारी।।४।।
 
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35 minutes ago

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