"सभ्यत_का_नकाब"
ऊँचे-ऊँचे चौराहों पर
जो गूँज रहा है शोर,
वे मुस्कुराकर कहते हैं—
"बदल गया है अब दौर!"
मगर गली के कोने में
जो जलता एक चिराग़ है,
उसकी बुझती लौ पर छपा
व्यवस्था का ही दाग़ है।
काग़ज़ के हसीं पन्नों पर
जो दावों की बौछार है,
हक़ीक़त की ज़मीं पर तो
बस रोटी का हाहाकार है!
जिस पसीने की बूँदों से
ये काँच के महल सजाए हैं,
उसी मजदूर ने आज अपने
बच्चे भूखे सुलाए हैं।
मखमली गद्दों पर बैठकर
जो मुफ़लिस का दर्द जताते हैं,
दरअसल वे ही तो चुपके से
उसके हक़ का निवाला खाते हैं!
कुर्सी, धर्म और ज़ात के नाम पर
रोज़ नए क़िस्से सुनाते हैं,
इंसान से इंसान को लड़वाकर
अपनी सियासत चमकाते हैं।
ऐ सोए हुए इंसान!
अब यह तमाशा देखना बंद करो,
झूठी इन लुभावनी बातों पर
यूँ सिर धुनना बंद करो!
उठो अब अपनी ही ताक़त से
हर बंद द्वार को खोलना है,
अन्याय के इस सन्नाटे में
अब सच को चीरकर बोलना है!
जब तक श्रम की हर बूँद का
वाजिब सम्मान न पाएगा,
यह सारा तथाकथित 'विकास'
महज़ एक मज़ाक ही कहलाएगा!
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