माँ की मटकी रूठकर , बैठी चौखट पास।
उसमें केवल जल नहीं , बसता था विश्वास।।१।।
तालाबों की पीठ पर , गहरी हुई दरार।
किसने छीना मेघ से , धरती का अधिकार।।२।।
नल में पानी देखकर, मत समझो सब ठीक।
यहीं गाँव की प्यास में , छिपी हुई है चीख।।३।।
जिस धरती ने पालकर , दिया अन्न हर बार।
आज उसी की प्यास पर, चुप है यह संसार।।४।।
धरती की नस काटकर , हमने खींचा नीर।
सूखे सरवर कह रहे , अब धरती की पीर।।५।।
नदियों के तट पूछते , कहाँ गए वे गाँव।
जिनके घर की साँस थी, तरु की शीतल छाँव।।६।।
प्यासा बच्चा पूछता, माँ! सरिता किस ओर?
माँ की आँखें कह रहीं , सूख गया वह छोर।।७।।
सूनी गागर में बसा , आँगन का इतिहास।
बूढ़ी आँखें ढूँढ़तीं , बीते दिन की प्यास।।८।।
धरती ने आकाश को , भेजा पीला पत्र।
एक घटा भेजो यहाँ , मलकर अच्छा इत्र।।९।।
कुआँ एक था गाँव में, सबका था अधिकार।
बँटते - बँटते जल गया , रिश्तों का संसार।।१०।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X