दिवाकर ने दी है दस्तक,
रश्मि ने छू लिया है उसका मस्तक।
अरुणिम किरणों की स्वर्णिम रेखा,
ले आई नवप्रभात की सुंदर लेखा।
कुसुमित हुए कल्पद्रुम के दल,
स्वर्णिम आभा ने बिखरा दिया जल।
ओस-कण मोती-से दे रहे दमक,
पत्ते भी नवजीवन से रहे चमक ।
चीं-चीं स्वर में खगों ने शुरू किया गान,
गूँज उठा उपवन, बढ़ गया प्रातःकाल का मान।
कलियों ने खोले अपने नयन,
मंद-मंद बहने लगी पवन।
भोर की बेला ने सजाया धरा का श्रृंगार,
हर ओर बिखरने लगा प्रकृति का अनुपम प्यार।
नव आशाओं से भर उठा मन,
जाग उठा जीवन, मुस्काया गगन।
स्वागत में दिवाकर के नयन हुए उज्ज्वल,
प्रकृति ने ओढ़ लिया स्वर्णिम आँचल।
नई उमंग, नई किरण, नई आशा का संचार,
लेकर आया सूरज जीवन में नव विचार।
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