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बेटियां

                
                                                         
                            है खुदा की इबादत सी ये बेटियां
                                                                 
                            
माँ की दौलत ये प्यारी लगें बेटियां।

शान घर की हमारी हैं ये बेटियां,
फिर क्यों अमानत है ये बेटियां।

मायके ससुराल रखती ये बेटियां,
क्यों घर नहीं पाती है ये बेटियां।

बचपन जीती अलग घर ये बेटियां,
फिर ब्याह दी जाती हैं ये बेटियां।

सुख दुख छुपा जीती हैं ये बेटियां,
किसी से कुछ न कहती ये बेटियां।

खुश रहती सबकी खुशी से ये बेटियां,
हर पल हँसी बाँटती हैं ये बेटियाँ।

पापा को प्यारी होती है ये बेटियां,
माँ का कलेजा होती है ये बेटियां।

दीवारों को घर बनाती हैं ये बेटियां,
हर दीवार को प्यार से सजाती ये बेटियां।

हर घर की आन होती हैं ये बेटियां,
फिर क्यों दर्द लाज का सहती ये बेटियां।

जिंदगी पर पाबंदी झेलती ये बेटियां,
बेटी,बहन,भाभी, माँ बनती ये बेटियां।

और क्या कहें सखी क्या हैं बेटियाँ,
एक आंख गर हैं बेटे तो दूजी हैं ये बेटियां।

- सखी

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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